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संस्कृति और विरासत

देवगढ़

ये गुप्तकालीन दशावतार मंदिर तथा चंदेलकालीन जैन मंदिर एवं लगभग 49 मंदिर हैं। जो पुरातात्विक एवं दर्शनीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस प्रकार देवगढ़ को केन्द्र बिन्दु मानकर एक सर्किट बनाया जा सकता है। जिससे पर्यटको सैलानियों को यहां के पर्यटक स्थलों को दखने की घूमने फिरने में 8-10 दिन की व्यवस्था हो सकती है। वैसे तो कई स्थान यहां उपलब्ध है। जिनके बारे में पर्यटन विकास के दृष्टिकोण से विचार किया जा सकता है और यहां विकास की संभावनायें नजर आती हैं। देवगढ़ में 5 वीं शताब्दी का भगवान विष्णु के अवतारों से सम्बन्धित गुप्तकालीन दशावतार मंदिर है तथा वही पर जिसका वर्तमान में नाम देवगढ़ दिगम्बर जैन मंदिरों के नाम से जाना जाता हैं। यहं पर 9 वी से 11 वीं शताब्दी तक जैन तीर्थकर महानुभावों के 49 मंदिर हैं। जो मुख्य रूप से मुख्य मंदिर भगवान शांतिनाथ जी को समर्पित है। इन स्थानों को भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है। यहां पर धर्मशाला एवं पर्यटक विभाग का आवास गृह भी है। इस क्षेत्र में भगवान महावीर के नाम पर भगवान महावीर वन जीव बिहार बनाया जा रहा है।

नीलकंठेश्वर मंदिर (पाली)

जिला मुख्यालय से करीब 35 कि.मी. दूर दक्षिण में स्थित नीकण्ठेश्वर पाली का मंदिर प्राकृतिक रमणीकता के साथ प्राचीन दुर्लभ कला के अनेक रहस्य छिपाये हुए है। त्रिमुखी भगवान शिव की प्रतिमा का तांत्रिक रहस्य छिपाये हुए है। त्रिमुखी भगवान शिव की प्रतिमा का तांत्रिक रहस्य आज भी जिज्ञासुओं के लिये अबूझ बना हुआ है। शिवभक्ति के सायुज्यावस्था में दर्शन अनूठी लौकिक घटना यहां देखी जा सकती है। इसी मंदिर में करीब 70 से.मी. ऊँचाई का एकमुखी शिवलिंग भी प्राचीन कला के अनेक रहस्य छिपाये हुए है। जिस पर शोध होना बाकी है/ विन्ध्य के वनों से आच्छादित उतंग श्रेणी पर स्थित इस मंदिर परिसर का वातावरण इतना रमणीक है कि सहज सैलानियों को इस ओर आकर्षित किया जा सकता है।

रणछोर मंदिर

यह बेतवा नदी के ग्राम धौर्रा – धौजरी क्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण को समर्पित रणछोर मंदिर है। ऐसी कथा है कि कालयवन से युद्ध के समय श्री कृष्ण भाग कर इस क्षेत्र में आये थे। यहां पर एक मुच्छ कुन्द गुफा है। यहां उसी स्थान में मुच्छ कुन्द ऋषी तपस्या कर रहे थे। उसी गुफा में श्री कृष्ण छिपे हुए थे। मुच्छ कुन्द से कालयवन को वहां पर भष्म कर दिया था। यहां पर मच्छ संक्राति के अवसर पर स्थानीय मेला आयोजन होता है। यह भी स्थान राज्य सरकार के पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है।

मदनपुर

अनेक चंदेल कालीन जैन मंदिर एवं उत्तरोत्तर काल के अनेक स्थान तथा मदन वर्मा का बसाया नगर एवं मदन सागर भगवान महावीर माता से सम्बन्धित मूर्ति भी है।

सिरोन खुर्द

यहां गुप्तकालीन हिन्दू मंदिर एवं जैन मन्दिर के अवशेष है। अनेक जैन मंदिर जो पुरातात्विक एवं अन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

अंडेला

प्रस्तुत स्थल ललितपुर से 7-8 कि.मी. दूरी पर वामन त्रिविक्रम की दो और बीच में सुदर्शन चक्रधारी विष्णु की अद्भुत प्रतिमाएं है, जो आधुनिक मंदिर में दर्शनीय है। इनके परिपाश्रव में देवरक्षादि लघु रूप में बने हैं। यह मूर्ति शिल्प एक ही प्रस्तर पर रूपायित है। सम्पूर्ण रचना अत्यन्त प्रभावोत्पादक सजीव और सुन्दर है।